Monday, 18 March 2019

Saturday, 29 December 2018

तुझे मेरी ज़रूरत अब नहीं। मुझे तेरी जरूरत अब नहीं।

एक दूसरे के इश्क़ को तड़पे थे हम,
ये नहीं की लगी सिर्फ तू मुझे ही खूबसूरत थी!
तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी।

वो २-३ बरस, २-३ जनम से गुज़रे थे,
मगर उन दूरियों में भी एक अलग सी मसर्रत थी!
क्यूँकि तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी।

हम मिल-मिलकर बिछड़ते रहे, धागा-धागा उलझते रहे,
ये सब खलता था हमें पर खुश रहने की फुरसत थी!
क्यूँकि तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी।

फिर खुदा का मौजज़ा दिखा,
हमें एक तोहफा मिला।
वो तोहफा हमारा दिल था जो
मेरा तूने रखा और तेरा मैंने रखा।
बरकत सी लगी ये दुनिया हमें,
जन्मों बाद खत्म हुई ये फुरकत थी!
अभी भी तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी।

जो दूरी कभी मीलों की थी वो साँसों की हो गई,
अब हर जगह बस तू थी और ये राहत-ए-कुरबत थी!
अभी भी तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी।

अचानक कहीं तुझे खो ना दूँ ये मुझे डर आया,
इस डर से मेरा दिल आँसुओ से भर आया,
बेफिज़ूली में नाराज़ रहने लगा मैं,
ना जिसका समझ मुझे कभी सबब आया।
तुझे अपनी हरकतों से दुखी करने लगा मैं,
नतीजा ये कि भरने लगी तेरी आब-ए-तल्ख थी!
क्या अभी भी तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी?

तू गुस्सा छुपाने लगी, मेरे एहसान-ए-जुर्म बढ़ाने लगी,
और मैं इस सवाल से घिर गया कि क्या बची हममें अब भी वो उल्फत थी?
क्या अभी भी तुझे मेरी ज़रूरत थी, मुझे तेरी ज़रूरत थी?

मेरे इश्क़ में पागलपन है, जुनून है,
तेरे इश्क़ में है शांति,
ये बात मैं बहुत अच्छे से हूँ जानता और
कहीं तू भी है ये जानती।
शायद तुझे इस जुनून की जरूरत नहीं,
और मुझे सबात की।
शायद तुझे मेरे डर की जरूरत नहीं,
और मुझे ये परेशान हयात की।
इश्क़ तो एहदे तर्के रहेगा हमारा इसमें कोई शक नहीं,
पर वो जुनून वो सुरूर अब नहीं!
शायद,
शायद तुझे मेरी ज़रूरत अब नहीं।
शायद मुझे तेरी जरूरत अब नहीं।

Saturday, 8 December 2018

तुम्हारा मिलना, बेवजह नहीं।

करीबी लोगों के तंज़ों से सताया गया हूँ मैं,
इन्हीं बेगैरतों से तुम भी सताई गई हो क्या?

सच जानते हुए भी सभा में झुटलाया गया हूँ मैं,
कभी तुम भी सच्ची होकर झुठलाई गई हो क्या?

इश्क़ की जलती आग में और भी जलाया गया हूँ मैं,
तुम भी किसी के इश्क़ में इस क़दर जलाई गई हो क्या?

सच्चे यारों के भी शिकंजे में उलझाया गया हूँ मैं,
इन्हीं कलंको की बातों में तुम भी उलझाई गई हो क्या?

उठना चाहा भी हर मुश्किल से तो गिराया गया हूँ मैं,
बदकिस्मती से तुम भी कभी गिराई गई हो क्या?

तो वजह क्या है खुदा? क्यों इस प्रश्न पर अटकाया गया हूँ मैं,
यूँ ही कभी मुझ जैसे से तुम मिलवाई गई हो क्या?

बेवजह तो नहीं तुझसे मिलवाया गया हूँ मैं,
खुदा के इस हरकत पर तुम भी अटकाई गई हो क्या?

उन्हें इश्क़ करना आ गया!

यहाँ हम अपने अच्छे-बुरे में उन्हें जोड़ते गए,
वहाँ उन्हें गुस्सा छुपाना आ गया!

यहाँ हम चीख-चीख कर थक गए,
वहाँ उन्हें चुप रहकर प्यार जताना आ गया!

यहाँ हम उन्हें नज़र भर देखने को तड़प गए,
वहाँ उन्हें हमें और भी ज़्यादा तड़पाना आ गया!

यहाँ हम परेशान होकर बेतुकी बातें करने लगे,
वहाँ उन्हें बेमतलब बातों का मतलब निकालना आ गया!

यहाँ हम गलती करते चले गए (और ना चाहते हुए भी),
वहाँ उन्हें हमें नीचा दिखाना आ गया!

बस किसी तरह हम एहसान-ए-जुर्म से उभर ही रहे थे
कि वहाँ हमारे नाम का उन्हें अश्क बहाना आ गया! 

Wednesday, 5 December 2018

आग


देखना,
आएगा कभी ऐसा दिन जब बैठे बैठे सुलगने लगोगी  तुम,
कि क्या है मेरा इश्क़ इस उलझन से सुलझने लगोगी तुम।
तुम सोच में डूबी रहोगी और तुम्हारी उंगलियाँ आग पकड़ लेंगी,
कि जिस भी बाग़ में बैठी होगी तुम, वहाँ की सारी तितलियाँ भी आग पकड़ लेंगी।
वो पूरा बागान राख़ हो जाएगा,
और इस आग की चपेट में पूरा शहर आ जाएगा।
वही शहर, जहाँ के लोगों ने तुम पर तंज़ कसे हैं,
वो सब भी जो तुम्हारे अकेलेपन पर हँसे हैं।
उनकी आँखें जलेंगी जिन्होंने तुम्हें बुरी नज़र से देखा है,
उनका शरीर जलेगा जिन्होंने तुम्हें बुरे इरादों से देखा है।
पूरा शहर धुएं में तब्दील हो रहा होगा,
तुम्हारा हुस्न आग में झुलस तब भी रहा होगा
पर, तन का एक हिस्सा भी तुम्हारा जला नहीं होगा,
ये है तो मेरा इश्क़ ही, इसमें तुम्हारा कुछ बुरा नहीं होगा।
और जैसे ही ये आग तुम्हारे मन में लग जाएगी,
ठीक उसी वक़्त ये कहर की आग थम जाएगी।
फिर एक प्यारी सी बौछार देखना खुदा कर देगा,
हमारी ज़िन्दगी से सारे काले साए हटा कर एक नई सुबह कर देगा।
इतना पाक है ये मेरा रिश्ता तुमसे,
ये ना सोचना की वो खुदा भी कभी हमें जुदा कर देगा।
और इतना खूबसूरत है तुम्हारा चेहरा ,
खुदा तुम्हें देख दो पल को खुद सजदे में सिर झुका ही देगा।
ए करिश्मा! ये तुम्हें मेरी मुहब्बत दिख क्यों नहीं रही?
गर दिख रही है तो तुम वहाँ सुलग क्यों नहीं रही?
तुम्हें सुलगाने की तड़प मुझे कुछ इस क़दर जकड़ रही है,
बस कह दो की मेरी बातों को सुनकर तुम्हारी उंगलियाँ आग पकड़ रहीं हैं। 

Wednesday, 28 November 2018

कोई भूल तो नहीं कर बैठा मैं?


तू मेरे इश्क़ के काबिल है, कहकर
मैंने कहीं तेरे भाव तो नहीं बढ़ा दिए?

तुझे तेरी वो एहमियत समझाकर कहीं
मैंने अपने ही घाव तो नहीं बढ़ा लिए?

तू अफ्लाकी परिंदा देखती है ख्वाबों में,
तुझे खुदसे जोड़कर मैंने कहीं तनाव तो नहीं बढ़ा लिए?

अब चुकीं जोड़ चुका तुझको खुद से तो
इस हरक़त से तूने कहीं अपने लगाव तो नहीं दबा लिए?

देख अपने स्वभाव में बदलाव ना लाना तू,
पर कहीं ये तो नहीं कि तूने सारे सुझाव ही बदलवा लिए?

और हाँ किसी दबाव के प्रभाव में भी ना आना तू,
तू आज़ाद परिंदा ही रहेगी,
ये नहीं के मेरे चलते तूने अपने बर्ताव ही हटा लिए!

तुझे इस इश्क़-विश्क के चक्कर में उलझा के,
मैंने कहीं दो ज़िन्दगी दाव पर तो नहीं लगा दिए?

तू मेरे इश्क़ के काबिल है, कहकर
मैंने कहीं तेरे भाव तो नहीं बढ़ा दिए?

Sunday, 11 November 2018

जब भी!

ना जाने कैसी छिड़ खुदसे जुस्तजू जाती है,
जब जब तू मेरे नज़रों से दूर जाती है।

कुछ अलग सा कर देने का सुरूर जगाती है,
जब जब तेरी पलकें मुझे देखकर झुक जाती हैं।

मेरी मंज़िल मुझसे रूबरू हो जाती है,
जब जब तू मेरी बाहों में खुल जाती है।

अगली सुबह एक अलग सी धूप आती है,
जब जब तू मेरे सपनों को छू जाती है।

फ़िरदौस में जीने सा सुकून लाती है,
जब जब मेरे जिस्म से तेरी खुशबू आती है।